Sunday , September 24 2017

प्रेरक प्रसंग

प्रेरक-प्रसंग : सत्कार और तिरस्कार

एक थका माँदा शिल्पकार लंबी यात्रा के बाद किसी छायादार वृक्ष के नीचे विश्राम के लिये बैठ गया। अचानक उसे सामने एक पत्थर का टुकड़ा पड़ा दिखाई दिया। उसने उस सुंदर पत्थर के टुकड़े को उठा लिया, सामने रखा और औजारों के थैले से छेनी-हथौड़ी निकालकर उसे तराशने के लिए ...

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प्रेरक-प्रसंग : स्वाभिमान

कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति का एक पत्र पाकर पं. मदन मोहन मालवीय असमंजस में पड़ गए। वे बुदबुदाए – “अजीब प्रस्ताव रखा है यह तो उन्होंने। क्या कहूँ, क्या लिखूँ?” पास बैठे एक सज्जन ने पूछा, “ऐसी क्या अजीब बात लिखी है पंडित जी उन्होंने।” वे मुसकुराकर बोले, “कलकत्ता विश्वविद्यालय ...

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प्रेरक-प्रसंग : नरक का द्वार

एक युवक था। वह बंदूक और तलवार चलाना सीख रहा था। इसलिए वह यदा-कदा जंगल जाकर खरगोश, लोमड़ी और पक्षियों आदि का शिकार करता। शिकार करते-करते उसे यह घमंड हो गया कि उसके जैसा निशानेबाज़ कोई नहीं है और न उसके जैसा कोई तलवार चलाने वाला। आगे चलकर वह इतना ...

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प्रेरक-प्रसंग : श्रम का पुरस्कार

बहुत दिनों पहले की बात है, गिलहरी पूरी तरह काली हुआ करती थी। छोटी-छोटी झाड़ियों के बीच, घास के मैदानों में, ऊँचे बड़े पेड़ों पर रेंगती फिरती कूदती फाँदती लेकिन लोग उसे सुंदर प्राणी नहीं समझते थे। गिलहरी को गाँव के परिवारों के साथ रहना पसंद था लेकिन गाँव वाले ...

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प्रेरक-प्रसंग : विश्वास

एक डाकू था जो साधू के भेष में रहता था। वह लूट का धन गरीबों में बाँटता था। एक दिन कुछ व्यापारियों का जुलूस उस डाकू के ठिकाने से गुज़र रहा था। सभी व्यापारियों को डाकू ने घेर लिया। डाकू की नज़रों से बचाकर एक व्यापारी रुपयों की थैली लेकर ...

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प्रेरक-प्रसंग : लालच

रेलवे स्टेशन पर मालगाड़ी से शीरे के बड़े-बड़े ड्रम उतारे जा रहे थे। उन ड्रमों से थोड़ा-थोड़ा शीरा मालगाड़ी के पास नीचे ज़मीन पर गिर रहा था। जहाँ शीरा गिरा था मक्खियाँ आकर बैठ गई और शीरा चाटने लगीं। ऐसा करने से उनके छोटे-छोटे मुलायम पंख उस शीरे में ही ...

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प्रेरक प्रसंग : रूप या गुण

सम्राट चंद्रगुप्त ने एक दिन अपने प्रतिभाशाली मंत्री चाणक्य से कहा- “कितना अच्छा होता कि तुम अगर रूपवान भी होते।“ चाणक्य ने उत्तर दिया, “महाराज रूप तो मृगतृष्णा है। आदमी की पहचान तो गुण और बुद्धि से ही होती है, रूप से नहीं।“ “क्या कोई ऐसा उदाहरण है जहाँ गुण ...

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प्रेरक-प्रसंग : रास्ते की रुकावट

विद्यार्थियों की एक टोली पढ़ने के लिए रोज़ाना अपने गाँव से छह-सात मील दूर दूसरे गाँव जाती थी। एक दिन जाते-जाते अचानक विद्यार्थियों को लगा कि उन में एक विद्यार्थी कम है। ढूँढने पर पता चला कि वह पीछे रह गया है। उसे एक विद्यार्थी ने पुकारा, “तुम वहाँ क्या ...

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प्रेरक-प्रसंग : महानता के लक्षण

एक बालक नित्य विद्यालय पढ़ने जाता था। घर में उसकी माता थी। माँ अपने बेटे पर प्राण न्योछावर किए रहती थी, उसकी हर माँग पूरी करने में आनंद का अनुभव करती। पुत्र भी पढ़ने-लिखने में बड़ा तेज़ और परिश्रमी था। खेल के समय खेलता, लेकिन पढ़ने के समय का ध्यान ...

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प्रेरक-प्रसंग : भाग्य का दोष

एक शिक्षण संस्थान की यह परंपरा थी – अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों में जो योग्यतम आठ-दस होते थे, उन्हें देश की औद्योगिक संस्थाएँ नियुक्त कर लेती थीं। उस साल भी वही हुआ। ऊपर के नौ लड़के ऊँची पद-प्रतिष्ठा वाली नौकरियाँ पाकर खुशी-खुशी चले गए। लेकिन उनके बीच का एक लड़का ...

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प्रेरक प्रसंग : संगत का असर

एक बार एक राजा शिकार के उद्देश्य से अपने काफिले के साथ किसी जंगल से गुजर रहे थे| दूर-दूर तक शिकार नजर नहीं आ रहा था, वे धीरे धीरे घनघोर जंगल में प्रवेश करते गए| अभी कुछ ही दूर गए थे की उन्हें कुछ डाकुओं के छिपने की जगह दिखाई ...

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प्रेरक-प्रसंग : प्रेमचंद और अंग्रेज जिलाधीश

उन दिनों प्रसिद्ध उपन्यास-लेखक मुंशी प्रेमचंद गोरखपुर में अध्यापक थे। उन्होंने अपने यहां गाय पाल रखी थी। एक दिन चरते-चरते उनकी गाय वहां के अंग्रेज़ जिलाधीश के आवास के बाहरवाले उद्यान में घुस गई। अभी वह गाय वहां जाकर खड़ी ही हुई थी कि वह अंग्रेज़ बंदूक लेकर बाहर आ ...

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प्रेरक-प्रसंग : पश्चाताप

कर्णवास का एक पंडित महर्षि दयानंद सरस्वती को प्रतिदिन गालियाँ दिया करता था, पर महर्षि शांत भाव से उन्हें सुनते रहते और उसे कुछ भी उत्तर न देते। एक दिन जब वह गाली देने नहीं आया तब महर्षि ने लोगों से उसके न आने का कारण पूछा। लोगों ने बताया, ...

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प्रेरक प्रसंग : भगवान हमें देख रहा है

एक बार मैं आधा किलो घी लेने गया. उसने मुझे 90 रूपय ज्यादा दे दिये. मैंने कुछ देर सोचा और पैसे लेकर निकल लिया. मैंने मन में सोचा कि 2-2 ग्राम से तूने जितना बचाया था बच्चू अब एक ही दिन में निकल गया. मैंने घर आकर अपनी गृहल्क्षमी को ...

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प्रेरक प्रसंग : वृद्धाश्रम

यात्रा के दौरान रेल में वर्षों वाद अपने एक परिचिच तिलककुमार जी से अचानक मुलाकात हो गई। पुरानी बतें चर्चा में आईं उनके गिरते स्वास्थ्य के प्रति मैंने सहानुभूति दिखलाई। पन्द्रह वर्ष पूर्व उनकी पत्नी के निधन की जानकारी पाकर दुख हुआ। अपने परिवार के बारे में उन्होंने बताया- सब सुखी ...

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प्रेरक-प्रसंग : प्रसन्नता

चंद्र प्रकाश के चार साल के बेटे को पंछियों से बेहद प्यार था। वह अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार रहता। ये सभी पंछी उसके घर के आंगन में जब कभी आते तो वह उनसे भरपूर खेलता। उन्हें जी भर कर दाने खिलाता। पेट भर कर जब पंछी उड़ते ...

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प्रेरक-प्रसंग : बच्चे की सीख

बचपन से ही मुझे अध्यापिका बनने तथा बच्चों को मारने का बड़ा शौक था। अभी मैं पाँच साल की ही थी कि छोटे-छोटे बच्चों का स्कूल लगा कर बैठ जाती। उन्हें लिखाती पढ़ाती और जब उन्हें कुछ न आता तो खूब मारती। मैं बड़ी होकर अध्यापिका बन गई। स्कूल जाने ...

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प्रेरक प्रसंग : सार्थक जीवन

गांधीजी एक छोटे से गांव में पहुंचे तो उनके दर्शनों के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। गांधीजी ने लोगों से पुछा इन दिनों आप कौन सा अन्न बो रहे हैं और किस अन्न की कटाई कर रहे हैं। भीड़ में से एक वृध्द व्यक्ति आगे आया और करबद्ध हो ...

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प्रेरक-प्रसंग : संयम

1926 की बात है। गांधी जी दक्षिण भारत की यात्रा पर थे। उनके साथ अन्य सहयोगियों के अलावा काकासाहेब कालेलकर भी थे। वे सुदूर दक्षिण में नागर-कोइल पहुंचे। वहां से कन्याकुमारी काफ़ी पास है। इस दौरे के पहले के किसी दौरे में गांधी जी कन्याकुमारी हो आए थे। वहां के ...

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प्रेरक प्रसंग : तितली का संघर्ष

एक बार एक लड़के ने पेड़ के पास एक तितली के खोल को देखा। उसने देखा कि तितली खोल से बाहर निकलने के लिए बार बार संघर्ष कर रही थी। उस लड़के को तितली पर दया आ गयी और उसने तितली की मदद करने की कोशिश की। उस लड़के ने ...

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