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आयुर्वेद विश्वविद्यालय की भर्ती पर बैठी जांच

आयुर्वेद विश्वविद्यालयदेहरादून। उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय की भर्ती प्रक्रिया जांच के दायरे में आ गई है। राजभवन के निर्देश पर शासन ने इसकी जांच बैठा दी है। जिसके बाद अब विवि से तमाम बिंदुओं पर जानकारी मांगी गई है।

विश्वविद्यालय ने 22 जुलाई को शैक्षणिक व गैर शैक्षणिक पदों पर विज्ञप्ति निकाली थी। जिसमें एक पखवाड़े के भीतर ही भारी फेरबदल कर दिया गया। संशोधित विज्ञप्ति में आयुर्वेद चिकित्साधिकारी के पदों पर उम्र सीमा बढ़ा दी गई थी। इसी तरह असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर व प्रोफेसर की भी आयु सीमा बढ़ाई गई।

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विवि द्वारा वर्ष 2016 में जारी पहली विज्ञप्ति से अब तक इसमें तीन बार संशोधन हो चुका है। पिछली विज्ञप्ति में भी दो बार अलग-अलग संशोधन हुए थे। यहां खास बात यह है कि विज्ञप्ति में फिजियोथेरेपिस्ट के पद को खास वरीयता दी गई है। इसमें अलग से एमपीटी को वरीयता एवं शासकीय संस्थान में कार्य अनुभव का अधिमान विशेष रूप से जोड़ा गया है। किसी अन्य पद के साथ ऐसा नहीं है। कुछ पदों में आरक्षित कोटे से भी छेड़छाड़ कर दी गई है। जो पद पहले आरक्षण के दायरे में थे उन्हें सामान्य और जो सामान्य में उन्हें आरक्षित कोटे में डाला दिया गया है।

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विश्वविद्यालय ने पूर्व में विज्ञापित रेडियोलॉजिस्ट आयुर्वेद, पैथोलोजिस्ट आयुर्वेद एवं एनस्थेटिस्ट आयुर्वेद के पदों में भी बदलाव किया है। मजेदार बात यह है कि विशेषज्ञता श्रेणी के हैं पद का वेतनमान आयुर्वेद चिकित्साधिकारी के बराबर रखा गया है। हाल में राजकीय आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा सेवा संघ ने भी भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि विवि एक्ट के अनुसार कार्यवाहक कुलपति व कुलसचिव को नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। इसके लिए विवि में कैबिनेट का दर्जा प्राप्त कार्य समिति की मंजूरी भी नहीं ली गई।

आयुष सचिव हरबंस चुघ ने बताया कि इस मामले की जांच कराई जा रही है। जांच अपर सचिव को दी गई है। उधर, कुलसचिव प्रो. अनूप गक्खड़ ने बताया कि शासन ने इस संदर्भ में कुछ जानकारियां मांगी थी। शासन के निर्देश पर सभी जानकारियां दे दी गई हैं।